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मनोरंजन नहीं, मनोदशा बिगड़ रही है: मोबाइल के बिना नहीं खाते बच्चे


चिकित्सकों की सलाह, कम करें स्क्रीन टाइम

रायगढ। जिस स्मार्टफोन को कभी मनोरंजन और संचार का जरिया माना जाता था, वही अब बच्चों के जीवन का अहम हिस्सा बन गया है। यह आदत उनके शारीरिक और मानसिक विकास दोनों को प्रभावित कर रही है। पहले जहां बच्चे टीवी पर कार्टून देखकर खाना खाते थे। अब टीवी की जगह मोबाइल ने ले ली है। हालत यह है कि नई पीढ़ी के बच्चों के लिए मोबाइल के बिना भोजन करना भी असंभव सा हो गया है।

अभिभावकों का कहना है कि अगर बच्चों को मोबाइल नहीं दें तो वे रोने लगते हैं। चिड़चिड़े हो जाते हैं- कभी-कभार तो घर की चीजें तक तोड़ देते हैं। उनकी नजरें लगातार स्क्रीन पर रहती हैं, जिससे वह यह भी नहीं समझ पाते कि क्या और कितना खा रहे हैं।

विशेषज्ञों के अनुसार यह प्रवृत्ति धीर-धीरे बच्चों में मानसिक असंतुलन और व्यवहारिक अस्थिरता का कारण बन रही है। विशेषज्ञों का कहना है कि मोबाइल देखते हुए खाना खाने से शरीर में पाचक एंजाइम और लार का उत्पादन कम हो जाता है। इससे भोजन ठीक से पच नहीं पाता और मेटाबॉलिज्म कमजोर हो जाता है। ऐसे में बच्चे यह महसूस नहीं कर पाते कि उन्हें कितनी भूख है। वे या तो बहुत कम खाते हैं या जरूरत से ज्यादा। यह स्थिति मोटापा, अपच और कमजोर पाचन तंत्र जैसी समस्याओं को जन्म देती है। इसके अलावा बढ़ता स्क्रीन टाइम बच्चों में नींद की कमी, सिरदर्द और मानसिक तनाव पैदा करता है। यह लत जितनी जल्दी छुड़ाई जाए उतना ही बच्चों के भविष्य के लिए बेहतर होगा ।

वरिष्ठ शिशु रोग विशेषज्ञ डॉ. पटवा का कहना है कि अभिभावकों को चाहिए कि वह बच्चों का स्क्रीन टाइम कम करें। बच्चों में बातचीत और कहानी सुनाने की आदत डालने की जरूरत हैं। बच्चों को आउटडोर गेस के लिए प्रेरित करना चाहिए, ताकि उनका मानसिक और शारीरिक विकास हो सके। इसके अलावा भी शतरंज, कैरम, बैडमिंटन जैसे कई खेलों में बच्चों की रूचि पैदा करने के प्रयास किए जाने चाहिए। ताकि उनका स्क्रीन पर कम से कम समय व्यतीत हो। डॉ. पटवा ने बताया कि बच्चों से एकदम मोबाइल छीनने के बजाय धीरे-धीरे समझाइश करते हुए स्क्रीन टाइम कम करें। बच्चों में परिवार के सदस्यों के साथ बैठकर भोजन करने की आदत डालें। उन्हें भोजन से मिलने वाले पौषक तत्वों के बारे में जानकारी दें। बच्चे के विरोध पर गुस्सा न करें, बल्कि उन्हें प्यार से समझाएं। बदलाव धीर-धीरे ही संभव है। स्मार्टफोन जीवन का हिस्सा बन चुका है, लेकिन बच्चों को खेलकूद, पढ़ाई और परिवार के साथ समय बिताने की दिशा में मोडऩा जरूरी है। तभी उनका समग्र विकास और भविष्य स्वस्थ हो सकेगा।

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