नवापारा (टेंडा) में प्रस्तावित विशाल स्टील प्लांट पर जनसुनवाई से पहले उठे गंभीर सवाल, 35.37 हेक्टेयर जमीन पर उद्योग का विस्तार तो होगा, लेकिन हवा, पानी, मिट्टी और खेती की सुरक्षा की गारंटी कौन देगा? पहले से औद्योगिक प्रदूषण की मार झेल रहे रायगढ़ को एक और भारी उद्योग का बोझ कितना भारी पड़ेगा, अब यही सबसे बड़ा सवाल
रायगढ़ । रायगढ़ जिले को छत्तीसगढ़ का औद्योगिक केंद्र बनाने की कीमत अब यहां की आबोहवा, जलस्रोतों, कृषि भूमि और आम लोगों के स्वास्थ्य को चुकानी पड़ रही है या नहीं, यह सवाल लंबे समय से उठता रहा है। जिले में पहले से बड़ी संख्या में स्पंज आयरन, स्टील, पावर, कोयला और अन्य भारी उद्योग संचालित हैं, ऐसे समय में बी.एस. स्पंज प्राइवेट लिमिटेड की नवापारा इकाई द्वारा नवापारा (टेंडा ) एवं चारमार क्षेत्र में प्रस्तावित विशाल स्टील एवं पावर परियोजना ने पर्यावरण को लेकर नई बहस छेड़ दी है। कंपनी के पर्यावरणीय दस्तावेज के अनुसार प्रस्तावित परियोजना के लिए लगभग 35.37 हेक्टेयर भूमि चिन्हित की गई है और परियोजना की अनुमानित लागत करीब 1,755 करोड़ रुपये बताई गई है। सवाल यह नहीं है कि रायगढ़ में निवेश कितना आएगा, सवाल यह है कि इस निवेश के बदले रायगढ़ की हवा, पानी और जमीन पर कितना पर्यावरणीय दबाव पड़ेगा।
परियोजना के कार्यकारी सारांश में जिस औद्योगिक ढांचे का उल्लेख किया गया है, वह सामान्य स्तर का कोई छोटा उद्योग नहीं बल्कि कई भारी औद्योगिक इकाइयों का संयुक्त विस्तार है। प्रस्ताव में स्पंज आयरन, स्टील बिलेट, टीएमटी बार, वायर रॉड, रोलिंग मिल, फेरो एलॉय, कोल गैसीफायर, कोयला वॉशरी और विद्युत उत्पादन से संबंधित इकाइयों का प्रावधान किया गया है। दस्तावेज में डीआरआई फर्नेस की कुल क्षमता 8,58,000 टीपीए, इंडक्शन फर्नेस के माध्यम से स्टील उत्पादन 7,92,000 टीपीए, इलेक्ट्रिक आर्क फर्नेस के माध्यम से करीब 3,30,000 टीपीए, रोलिंग मिल से 7,92,000 टीपीए तथा कोल वॉशरी की क्षमता 22,50,000 टीपीए बताई गई है। इसके अलावा फेरो एलॉय और अन्य औद्योगिक उत्पादन इकाइयों की भी बड़ी क्षमताएं प्रस्तावित हैं। यानी परियोजना का वास्तविक स्वरूप एक बहु-इकाई भारी औद्योगिक परिसर का है, जिसका पर्यावरणीय प्रभाव भी उसी अनुपात में व्यापक होने की आशंका है।
सबसे बड़ा सवाल वायु प्रदूषण का है
स्पंज आयरन, स्टील निर्माण, कोयला आधारित प्रक्रियाओं, गैसीफिकेशन और भारी औद्योगिक परिवहन जैसी गतिविधियों में धूल एवं विभिन्न गैसीय प्रदूषकों के उत्सर्जन की संभावना रहती है। परियोजना शुरू होने के बाद उत्सर्जन नियंत्रण उपकरण कितनी प्रभावी तरीके से काम करेंगे, उनकी चौबीसों घंटे निगरानी कैसे होगी और आसपास के गांवों की वास्तविक वायु गुणवत्ता क्या होगी, इसका जवाब केवल कागजी दावों से नहीं बल्कि पारदर्शी और स्वतंत्र निगरानी से मिलना चाहिए। रायगढ़ पहले ही औद्योगिक प्रदूषण को लेकर गंभीर सवालों के घेरे में रहा है। ऐसे में नई परियोजना के प्रभाव का आकलन केवल अलग-अलग इकाइयों के आधार पर नहीं बल्कि पूरे क्षेत्र पर पड़ने वाले संचयी पर्यावरणीय प्रभाव के आधार पर किया जाना जरूरी है।
पानी को लेकर भी खतरा कम नहीं है
किसी भी बड़े स्टील एवं पावर संयंत्र के लिए भारी मात्रा में पानी की आवश्यकता होती है। परियोजना से संबंधित पर्यावरणीय दस्तावेज में जल संसाधनों और जल उपयोग का आकलन किया गया है। ऐसे में यह स्पष्ट किया जाना जरूरी है कि संयंत्र के लिए पानी कहां से आएगा, स्थानीय जल स्रोतों पर उसका कितना दबाव पड़ेगा, भू-जल का स्तर प्रभावित होगा या नहीं और औद्योगिक प्रक्रिया से निकलने वाले पानी का उपचार किस स्तर पर किया जाएगा। यदि उद्योग के लिए पानी की आवश्यकता बढ़ती है तो आसपास के गांवों, किसानों और प्राकृतिक जलस्रोतों पर इसका प्रभाव क्या होगा, इसका जवाब भी जनसुनवाई में स्पष्ट रूप से दिया जाना चाहिए। विकास के नाम पर उद्योग को पानी और गांवों को सूखते कुएं मिलना किसी भी स्थिति में स्वीकार्य व्यवस्था नहीं हो सकती।
औद्योगिक अपशिष्ट का सवाल भी बेहद गंभीर है
इतनी बड़ी उत्पादन क्षमता के साथ फ्लाई ऐश, बॉटम ऐश, स्लैग, धूल, औद्योगिक ठोस अपशिष्ट और अन्य प्रक्रिया अपशिष्ट उत्पन्न होना स्वाभाविक है। दस्तावेज में प्रस्तावित विभिन्न उत्पादन इकाइयों के साथ अपशिष्ट प्रबंधन और पर्यावरण प्रबंधन व्यवस्था का उल्लेख किया गया है, लेकिन असली परीक्षा इस बात की होगी कि इन अपशिष्टों का वास्तविक प्रबंधन जमीन पर किस प्रकार होता है। यदि राख, स्लैग अथवा अन्य औद्योगिक सामग्री का वैज्ञानिक तरीके से उपयोग या निपटान नहीं हुआ तो इसका सीधा असर जमीन, कृषि और जलस्रोतों पर पड़ सकता है। इसलिए जनसुनवाई में केवल यह बताना पर्याप्त नहीं होना चाहिए कि अपशिष्ट का प्रबंधन किया जाएगा, बल्कि यह भी स्पष्ट होना चाहिए कि प्रतिदिन और प्रतिवर्ष कितना अपशिष्ट पैदा होगा, उसका उपयोग या निपटारा कहां किया जाएगा और उसकी निगरानी कौन करेगा।
परियोजना के लिए प्रस्तावित 35.37 हेक्टेयर भूमि का सवाल भी कम महत्वपूर्ण नहीं है। औद्योगिक परियोजना के लिए भूमि का उपयोग बदलने का असर केवल उस जमीन तक सीमित नहीं रहता। निर्माण, सड़कों, कच्चे माल के भंडारण, भारी वाहनों की आवाजाही, जल निकासी और औद्योगिक गतिविधियों के कारण आसपास के क्षेत्र की प्राकृतिक व्यवस्था प्रभावित हो सकती है। यदि कृषि भूमि के आसपास भारी उद्योग स्थापित होता है तो धूल, उत्सर्जन और औद्योगिक गतिविधियों का संभावित प्रभाव खेती और ग्रामीण जीवन पर पड़ सकता है। इसलिए पर्यावरणीय मूल्यांकन में केवल प्लांट की चारदीवारी के भीतर का प्रभाव नहीं बल्कि आसपास के गांवों और कृषि क्षेत्र पर पड़ने वाला प्रभाव भी गंभीरता से देखा जाना चाहिए।
भारी वाहनों की आवाजाही भी आने वाले समय में बड़ी समस्या बन सकती है। स्टील उद्योग के लिए लौह अयस्क, कोयला, चूना पत्थर और अन्य कच्चे माल की लगातार आपूर्ति तथा तैयार माल की ढुलाई के लिए बड़ी संख्या में भारी वाहनों की आवश्यकता होती है। इसका असर सड़कों पर यातायात दबाव, सड़क किनारे धूल, शोर, दुर्घटना की आशंका और ग्रामीण आबादी की सुरक्षा पर पड़ सकता है। इसलिए परियोजना के पर्यावरणीय प्रभाव का आकलन करते समय यह भी बताया जाना चाहिए कि प्रतिदिन कितने भारी वाहन प्रस्तावित परियोजना के कारण सड़कों पर आएंगे और उनके लिए सुरक्षित परिवहन व्यवस्था क्या होगी।
रायगढ़ की पर्यावरणीय वहन क्षमता पर कोई चर्चा ही नहीं
रायगढ़ की सबसे बड़ी समस्या यह है कि यहां उद्योगों की संख्या बढ़ाने की चर्चा तो लगातार होती है, लेकिन जिले की पर्यावरणीय वहन क्षमता पर उतनी गंभीर चर्चा नहीं होती। एक उद्योग का प्रदूषण अलग से देखने के बजाय जब जिले में पहले से संचालित सभी उद्योगों के उत्सर्जन, जल उपयोग, औद्योगिक कचरे और परिवहन दबाव को जोड़कर देखा जाएगा, तभी यह पता चलेगा कि रायगढ़ की पर्यावरणीय सीमा आखिर कहां तक पहुंच चुकी है। ऐसे समय में बी.एस. स्पंज प्राइवेट लिमिटेड की प्रस्तावित परियोजना को केवल निवेश, उत्पादन और रोजगार के आंकड़ों से उचित ठहराना पर्याप्त नहीं होगा। यह भी साबित करना होगा कि परियोजना रायगढ़ के पर्यावरण पर अतिरिक्त दबाव डालते हुए भी स्थानीय लोगों के जीवन, कृषि, जल और स्वास्थ्य के लिए स्वीकार्य जोखिम सीमा के भीतर रहेगी।
जनसुनवाई में अब केवल औपचारिकता नहीं, बल्कि ज्वलन्त सवालों के जवाब चाहिए
पर्यावरणीय जनसुनवाई को यदि केवल प्रक्रिया पूरी करने की औपचारिकता बना दिया गया तो इसका उद्देश्य ही खत्म हो जाएगा। स्थानीय ग्रामीणों को यह जानने का पूरा अवसर मिलना चाहिए कि परियोजना से कितनी मात्रा में पानी लिया जाएगा, कितनी मात्रा में औद्योगिक अपशिष्ट निकलेगा, वायु प्रदूषण रोकने के लिए कौन-कौन से उपकरण लगाए जाएंगे, उनके संचालन की निगरानी कौन करेगा, भारी वाहनों की संख्या कितनी बढ़ेगी और किसी भी दुर्घटना अथवा प्रदूषण नियंत्रण प्रणाली के विफल होने की स्थिति में आसपास के गांवों की सुरक्षा के लिए क्या व्यवस्था होगी। सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि परियोजना से पहले और परियोजना शुरू होने के बाद पर्यावरण की वास्तविक स्थिति की तुलना करने के लिए पारदर्शी निगरानी व्यवस्था होनी चाहिए।
सबसे बड़ा सवाल यही है कि रायगढ़ को विकास चाहिए या प्रदूषण का विस्तार?
यह सवाल उद्योग विरोध का नहीं बल्कि जिम्मेदार और टिकाऊ विकास का है। उद्योग आएं, निवेश आए, रोजगार पैदा हों और स्थानीय अर्थव्यवस्था मजबूत हो, इसका विरोध कोई नहीं कर सकता। लेकिन यदि औद्योगिक विकास के साथ हवा जहरीली होने लगे, जलस्रोतों पर दबाव बढ़े, कृषि प्रभावित हो और आने वाली पीढ़ियों के लिए स्वस्थ वातावरण बचाना मुश्किल हो जाए तो उस विकास के मॉडल पर सवाल उठाना जरूरी है। बी.एस. स्पंज प्राइवेट लिमिटेड की प्रस्तावित परियोजना को लेकर भी यही अपेक्षा है कि पर्यावरणीय सुरक्षा के सभी पहलुओं को सार्वजनिक रूप से स्पष्ट किया जाए और स्थानीय जनता के सवालों का संतोषजनक जवाब दिया जाए। रायगढ़ पहले ही औद्योगिक प्रदूषण का भार उठा रहा है। ऐसे में एक और बड़े स्टील एवं पावर प्लांट की स्थापना से पहले यह तय होना चाहिए कि उद्योग की चिमनियों से निकलने वाले धुएं की कीमत रायगढ़ के लोग अपनी सांसों से तो नहीं चुकाएंगे, उद्योग की पानी की जरूरत गांवों के जलस्रोतों पर तो भारी नहीं पड़ेगी, औद्योगिक अपशिष्ट किसानों की जमीन और प्राकृतिक जलस्रोतों के लिए खतरा तो नहीं बनेगा और विकास के नाम पर आने वाली पीढ़ियों का पर्यावरण तो बर्बाद नहीं होगा।
रायगढ़ को उद्योग चाहिए, लेकिन अपनी सांसों की कीमत पर नहीं
अब समय है कि जनसुनवाई में सिर्फ कंपनी की योजनाएं न सुनी जाएं, बल्कि जनता की आशंकाओं और विशेषज्ञों के सवालों को भी उतनी ही गंभीरता से सुना जाए। 1,755 करोड़ रुपये का निवेश बड़ा हो सकता है, उत्पादन क्षमता बड़ी हो सकती है, लेकिन रायगढ़ की हवा, पानी, जमीन और लोगों का स्वास्थ्य उससे भी बड़ा सवाल है। विकास तभी स्वीकार्य है जब वह पर्यावरण की सुरक्षा के साथ हो। रायगढ़ की जमीन पर उद्योगों का विस्तार हो सकता है, लेकिन रायगढ़ की हवा और पानी को प्रदूषण की स्थायी कीमत नहीं बनाया जा सकता। अब फैसला केवल यह नहीं होना चाहिए कि बी.एस. स्पंज की परियोजना कितनी बड़ी है, बल्कि यह भी होना चाहिए कि रायगढ़ के पर्यावरण की कीमत आखिर कितनी बड़ी होगी।














