गोकुल सोनी साथियो, समय-समय पर मैं रायपुर की पुरानी बस्तियों, चौक-चौराहों और पारों के उन नामों की कहानी लेकर आता हूं, जिनके पीछे हमारे शहर का कोई न कोई भूला-बिसरा इतिहास छिपा हुआ है। आप सभी इसे खूब पसंद करते हैं। उसी कड़ी में आज बात करते हैं रायपुर के कलाईपारा की। यह कलाईपारा नवीन बाजार के पास, गोरस भंडार के बाजू में बसा हुआ है।
नाम सुनकर शायद आज की पीढ़ी सोचती होगी—आखिर ‘कलाई’ से इस मोहल्ले का क्या संबंध ? तो चलिए, थोड़ा पीछे चलते हैं। उस दौर में, जब हमारे घरों की रसोई में स्टील के बर्तनों ने जगह नहीं बनाई थी। तब घर-घर में पीतल के बर्तन हुआ करते थे। पीतल यानी मुख्य रूप से तांबा और जस्ता की मिश्रधातु। बड़े-बड़े पीतल के भगोने, थालियां, लोटे, गिलास और हांड़ियां, यही हमारे घरों की शान हुआ करती थीं।
लेकिन पीतल के बर्तनों की एक परेशानी भी थी। खासकर खट्टे या अम्लीय भोजन को लंबे समय तक इसपर रखने से भोजन विषैला हो जाता था। अगर गलती से इस भोजन को कोई खा ले तो फूड पॉइजनिंग से उसे उल्टी, दस्त, पेट में मरोड़ और कमजोरी हो जाता था। खाने वाला बिमार पड़ जाता मृत्यु तक हो जाती थी। इसी परेशानी से बचने के लिये बर्तन के अंदर एक पतली परत चढ़ाई जाती थी, ताकि भोजन का सीधे पीतल से संपर्क न हो। और, इसी प्रक्रिया को कहा जाता था—कलाई करना।
अब जरा उस जमाने के कारीगर की कल्पना कीजिए। सबसे पहले बर्तन को खूब अच्छी तरह साफ किया जाता था। फिर उसे आग पर गर्म किया जाता। गर्म बर्तन पर नौसादर का पाउडर डाला जाता। इसके बाद आता था असली हुनर।
बर्तन को गर्म रखते हुए उस पर रांगा यानी टिन लगाया जाता और कपड़े या रूई की मदद से उसे तेजी से पूरे बर्तन के भीतर फैला दिया जाता।
कारीगर के हाथों का कमाल देखिए—कुछ ही देर में पीतल के बर्तन के भीतर रांगे की बेहद पतली, चमकदार परत चढ़ जाती थी। यही थी कलाई।
आज मशीनें हैं, आधुनिक बर्तन हैं, चमकाने के हजारों तरीके हैं। लेकिन उस समय यह काम सिर्फ एक हुनर नहीं, बल्कि कारीगर की पीढ़ियों से चली आ रही कला हुआ करती थी।
रायपुर के गोल बाजार में जिसने कभी अंदर जाकर देखा होगा, उसे शायद आज भी याद होगा—गुंबद के नीचे बैठा एक कारीगर आग की तपिश के बीच बर्तन पर कलाई करता दिखाई देता था। और यह काम सिर्फ गोल बाजार तक सीमित नहीं था। रायपुर में कलाई करने वाले कई परिवार थे और उनमें से अधिकांश इसी इलाके में रहते थे। और आपकी याद ताजा कर दूं। इसी कलाई करने वाले के पास एक विक्षिप्त महिला भी हमेशा बैठी रहती थी जो दिनभर कागज को फाड-फाड कर वहां इकट्ठा करती थी। कुछ याद आया ?
कलाई करने कारीगरों की बस्ती बनी और बस्ती का नाम पड़ गया—कलाईपारा।
बताया जाता है कि यहां सबसे पहले शेख रहमान कलाई का काम किया करते थे। उनके बाद उनके बेटे शेख रसीद ने भी यही काम संभाला। इनके अलावा शेख हनीफ ने भी अपने दादा और पिता की इस पारंपरिक कला को आगे बढ़ाया। लेकिन हर कहानी का एक मोड़ होता है।
साल 1992…………….
गोल बाजार में लगी भीषण आग ने बहुत कुछ बदल दिया। आग में कलाई करने वालों का सामान और दुकानें भी जलकर खाक हो गईं। इसके बाद धीरे-धीरे यह पारंपरिक काम बंद होता चला गया। वैसे भी तब तक स्टील के बर्तनों का चलन तेजी से बढ़ चुका था। पीतल के बर्तन कम होते गए और उनके साथ कलाई करने वाले कारीगरों की जरूरत भी। देखते ही देखते तीन पीढ़ियों से चला आ रहा एक हुनर इतिहास बन गया।
लेकिन कहानी यहीं खत्म नहीं होती। इस परिवार की चौथी पीढ़ी के शेख तारीक ने पुश्तैनी कलाई का काम छोड़कर ए.सी. और फ्रिज रिपेयरिंग का काम अपना लिया। कुछ लोग ताला-चाबी बनाने का काम करने लग गये । समय बदल गया, बर्तन बदल गए, रसोई बदल गई, और एक दिन कलाई की चमक भी रायपुर की गलियों से गायब हो गई। लेकिन नाम आज भी जिंदा है— कलाईपारा।
कभी-कभी किसी मोहल्ले का नाम सिर्फ एक नाम नहीं होता। उसके पीछे किसी कारीगर का हुनर, किसी परिवार की मेहनत और पूरे शहर की एक बीती हुई जिंदगी छिपी होती है। कलाईपारा भी रायपुर की उसी भूली-बिसरी कहानी का एक पन्ना है।
अब आप बताइए…
क्या आपके घर में भी कभी पीतल के बर्तन हुआ करते थे ? क्या आपकी दादी-नानी या घर के बड़े लोग बर्तनों में कलाई करवाते थे ? अगर याद है तो कमेंट में जरूर लिखिए। हो सकता है आपकी एक छोटी-सी याद रायपुर के इतिहास का कोई बड़ा किस्सा सामने ले आए।
और हां…
कलाईपारा के पीछे एक और पारा है— कमासीपारा।
अब सवाल यह है कि, आखिर इस मोहल्ले का नाम “कमासीपारा” क्यों पड़ा ? और इस नाम के पीछे रायपुर की कौन-सी पुरानी कहानी छिपी है ?
अगर किसी साथी को इसकी पक्की जानकारी हो तो कमेंट में जरूर बताइए। रायपुर के पुराने नामों और पुरानी यादों की यह यात्रा अभी जारी है।














