10 पैसे की ‘भगवती चाय’ के लिए लगती थी लाइन, दिन में तीन बार खाली होता था गल्ला
गोकुल सोनी
साथियो, आज चाय की बात हो तो ‘अमृततुल्य चाय’ का नाम खूब सुनाई देता है। लोग उसके स्वाद की तारीफ करते हैं। लेकिन रायपुर की भी एक ऐसी चाय थी, जिसकी चर्चा कभी सिर्फ रायपुर में नहीं, बल्कि पूरे मध्यप्रदेश में हुआ करती थी। जी हां… बात हो रही है ‘भगवती चाय’ की।
आज की युवा पीढ़ी में शायद बहुत कम लोग जानते होंगे कि कभी रायपुर में चाय की एक ऐसी दुकान हुआ करती थी, जहां चाय पीना भी एक तरह का अनुभव था और उसकी चर्चा करना भी।
रायपुर में दो दुकानें थीं मशहूर………………..
उन दिनों रायपुर में चाय की दो दुकानें खास तौर पर प्रसिद्ध थीं। एक थी भगवती चाय दुकान, जो जयस्तंभ चौक के पास गैस मेमोरियल सेंटर के सामने थी। आज उस जगह पर BSNL का कार्यालय है। दूसरी थी स्टेशन रोड की ‘अमीर-गरीब चाय’। आज बात करते हैं उस चाय की, जिसका नाम ही अपने आप में एक पहचान बन गया था। भगवती चाय।
दो रुपये की मजदूरी से शुरू हुई कहानी…………….
भगवती प्रसाद वर्मा जी बलौदाबाजार के पास स्थित मोहरा गांव के रहने वाले थे। काम की तलाश में वे 1961 में रायपुर आए। उस समय वे बबला व्यास जी की कंपनी रायपुर डीजल्स में काम करते थे। मजदूरी थी सिर्फ दो रुपये।
लेकिन भगवती जी में एक हुनर था। वह था चाय बनाने का हुनर।
वे अक्सर बबला व्यास जी को अपने हाथ से चाय बनाकर पिलाते थे।
चाय ऐसी बनती कि व्यास जी उसकी खूब तारीफ करते। एक दिन उन्होंने भगवती जी से कह दिया— भगवती, तुम चाय की दुकान क्यों नहीं खोल लेते ? तुम्हारी दुकान खूब चलेगी। बस, यही बात भगवती प्रसाद जी के जीवन की दिशा बदलने वाली साबित हुई।
1962 में खुली छोटी-सी दुकान…………
बबला व्यास जी के सहयोग और प्रोत्साहन से 1962 में रायपुर डीजल्स के सामने एक छोटी-सी चाय की दुकान शुरू हुई। दुकान छोटी थी, लेकिन चाय का स्वाद बड़ा था। धीरे-धीरे दुकान चल निकली और फिर ऐसा समय आया कि भगवती चाय रायपुर की पहचान बन गई। लोग दूर-दूर से चाय पीने आने लगे। और बात सिर्फ शहर तक नहीं रुकी, पूरे प्रदेश में भगवती चाय की चर्चा होने लगी।
सुबह चार बजे से आधी रात तक………………..
आज की तरह तब दुकानें निश्चित समय पर खुलती-बंद नहीं होती थीं। भगवती चाय की दुकान सुबह चार बजे खुल जाती थी और बंद ? सेकेंड शो की फिल्म छूटने के बाद। यानी रात के बारह बजे के बाद तक दुकान गुलजार रहती थी।
सोचिए, सुबह की पहली चाय से लेकर रात के आखिरी फिल्म शो के दर्शकों तक। भगवती चाय का सिलसिला चलता रहता था।
दो-तीन भट्टियां, और बड़े-बड़े गंजी में चाय…………..
दुकान में मिट्टी की बनी दो-तीन भट्टियां रहती थीं। एक भट्टी पर दूध दूसरी पर चाय। और बड़े-बड़े गंजी में चाय लगातार खौलती रहती थी। भट्टियों में लकड़ी जलती थी और लकड़ी आती थी बढ़ईपारा से। आसपास दो-तीन टॉकीज थीं, कॉलेज था और आने-जाने वालों की भी अच्छी-खासी भीड़ रहती थी। इसलिए भगवती चाय की दुकान पर हमेशा चहल-पहल रहती थी।
रायपुर से गुजर रहे हैं और भगवती चाय नहीं पी तो जैसे यात्रा अधूरी।
रोज 80 लीटर से ज्यादा दूध!………
आज हम दूध का पाउच फाड़कर चाय बना लेते हैं। लेकिन तब दूध ऐसे नहीं आता था। गांवों से लोग भैंस का दूध लेकर आते थे। भगवती चाय में दूध की गुणवत्ता को लेकर कोई समझौता नहीं था। गाढ़ा दूध चाहिए पतला दूध नहीं?
कभी-कभी दूध की गुणवत्ता जांचने के लिए उससे खोवा तक निकलवाया जाता था। सोचिए, रोज 80 लीटर से ज्यादा दूध खपाने वाली वह छोटी-सी चाय दुकान कितनी बड़ी भीड़ संभालती होगी।
कप धुला नहीं कि ग्राहक तैयार…………….
भगवती चाय की लोकप्रियता का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि कप धुलकर जैसे ही ट्रे में आते, ग्राहक खुद कप उठाकर चाय के लिए खड़े हो जाते थे। कई बार तो बाकायदा लाइन लग जाती थी। आज तो हम चाय के लिए कैफे में बैठकर ऑर्डर का इंतजार करते हैं। तब रायपुर में लोग कप आने का इंतजार करते थे।
20 लड़के दौड़ते थे चाय लेकर…………..
दुकान में उस समय करीब 20 लड़के नियमित रूप से काम करते थे। ये लड़के चाय लेकर निकलते और फाफाडीह, कोतवाली, सदरबाजार, फूलचौक तक चाय पहुंचाते थे। यानी यह सिर्फ चाय की दुकान नहीं थी, अपने समय की एक छोटी-सी चाय डिलीवरी व्यवस्था भी थी। वह भी बिना मोबाइल, बिना ऐप और बिना ऑनलाइन ऑर्डर के। बस आवाज लगाइए चाय भेज देना।
एक कप चाय… सिर्फ दस पैसे…………..
जब भगवती प्रसाद वर्मा जी ने 1962 में दुकान शुरू की, तब एक कप चाय की कीमत थी— सिर्फ 10 पैसे। और सबसे दिलचस्प बात यहां VIP और आम आदमी के लिए अलग-अलग चाय नहीं बनती थी। जिसने भी चाय मांगी
एक ही चाय, एक ही स्वाद। चाय के सामने कोई बड़ा-छोटा नहीं। आज के ‘स्पेशल’, ‘प्रीमियम’, ‘सुपर प्रीमियम’ जमाने से बहुत पहले भगवती चाय का अपना ही स्टैंडर्ड था।
आखिर चाय में ऐसा क्या डालते थे?……………
यह सवाल मेरे मन में भी आया। आखिर ऐसी क्या खास चीज मिलाई जाती थी कि चाय इतनी स्वादिष्ट बनती थी ? मैंने भगवती प्रसाद जी के छोटे बेटे देवेन्द्र वर्मा जी से यही सवाल किया।
उनका जवाब सुनकर शायद आपको भी आश्चर्य होगा। उन्होंने बताया—
“हम चाय में कुछ भी अलग से नहीं मिलाते थे।” न इलायची, न अदरक न कोई खास मसाला। फिर ? सिर्फ अच्छी चाय, अच्छा दूध और बनाने का अपना तरीका। उस समय वे ब्रुक बॉन्ड की चायपत्ती इस्तेमाल करते थे। शायद स्वाद का राज किसी गुप्त मसाले में नही। क्वालिटी, मात्रा और बनाने वाले के हाथ में था।
चाय की पेटियां आती थीं… लकड़ी की………….
आज चाय किलो के पैकेट में आती है। तब भगवती चाय के लिए चायपत्ती बड़ी-बड़ी लकड़ी की पेटियों में आती थी। चाय की खपत इतनी ज्यादा थी कि खाली पेटियां भी इतनी जमा हो जाती थीं कि रखने की जगह नहीं बचती थी।
फिर जिसका मन हुआ खाली पेटी उठाकर ले गया। और ब्रुक बॉन्ड वालों ने भगवती चाय की खपत देखकर उस समय उन्हें एक लूना तक उपहार में दी थी। भगवती जी ने लूना बेचकर राजदूत मोटरसाइकिल खरीद ली।
दिन में तीन बार गल्ला खाली……………….
अब इस दुकान की लोकप्रियता का असली अंदाजा लगाइए। चाय की कीमत थी केवल 10 पैसे के आसपास, लेकिन बिक्री इतनी होती थी कि दुकान का गल्ला दिन में तीन बार खाली करना पड़ता था। चाय सस्ती थी लेकिन ग्राहक हजारों। और, यही छोटी-सी चाय की दुकान धीरे-धीरे भगवती प्रसाद जी के लिए इतनी बड़ी सफलता बन गई कि उन्होंने गांव में खेत और शहर में बड़ी जगहें खरीदीं।
चाय में अफीम का छिलका ……………..
हर मशहूर चीज के साथ एक कहानी मुफ्त में चलती है। एक समय किसी ने खाद्य विभाग में शिकायत कर दी कि भगवती चाय में ‘टोड़ा’ यानी अफीम का छिलका मिलाया जाता है। शिकायत गंभीर थी। खाद्य विभाग की टीम दलबल के साथ जांच करने पहुंच गई। अधिकारियों ने चाय बनाने को कहा। भगवती प्रसाद जी चाय बनाने लगे। लेकिन अधिकारियों ने कहा— “जो चाय बनी हुई है, उसी में से पिलाइए।” अधिकारियों ने चाय पी, सैंपल लिया गया, और जांच के बाद शिकायत झूठी पाई गई। यानी चाय का स्वाद इतना जबरदस्त था कि लोगों को उसमें भी कोई ‘राज’ नजर आने लगा था।
स्टेशन से जयस्तंभ तक… नाम ही काफी था…………….
उस जमाने की लोकप्रियता का एक और मजेदार किस्सा सुनिए। अगर कोई यात्री ट्रेन से उतर कर बाहर निकलता और रिक्शेवाले से कहता— जयस्तंभ चौक चलो। तो रिक्शेवाला अक्सर पूछता— भगवती चाय दुकान के पास चलना है क्या ? यानी पता पूछने की जरूरत नहीं। भगवती चाय दुकान ही एक लैंडमार्क थी। आज हम Google Maps में लोकेशन खोजते हैं। तब रायपुर में भगवती चाय पूछ लो, रास्ता मिल जाता था
2008 में बंद हुई दुकान…………………….
जिस जगह पर यह दुकान चलती थी, वह जगह किराये की थी और उसका मामला न्यायालय में भी चल रहा था। जब वहां BSNL कार्यालय का निर्माण शुरू हुआ तो 2008 में भगवती प्रसाद जी को वह जगह खाली करनी पड़ी। इसके बाद उन्होंने कोई दूसरा व्यवसाय शुरू नहीं किया।
और फिर , 2017 में उनका निधन हो गया। एक दौर खत्म हो गया। लेकिन भगवती चाय की कहानी खत्म नहीं हुई।
भगवती नाम आज भी जिंदा है………………..
भगवती प्रसाद वर्मा जी के दो पुत्र हैं। बड़े पुत्र कमल वर्मा दूसरे काम से जुड़े हैं। छोटे पुत्र देवेन्द्र वर्मा आज गोलचौक, रायपुर में एक रेस्टोरेंट संचालित करते हैं। सबसे अच्छी बात यह है कि उन्होंने रेस्टोरेंट का नाम भी अपने पिता की स्मृति में ‘भगवती’ रखा है। और वहां मिलने वाला नाश्ता भी रायपुर में अपनी पहचान बना चुका है। यानी, दुकान भले बंद हो गई, लेकिन भगवती नाम की खुशबू अभी भी बाकी है।
यह सिर्फ चाय की कहानी नहीं है…
भगवती चाय की कहानी सिर्फ एक दुकान की कहानी नहीं है। यह उस रायपुर की कहानी है जहां दुकानें छोटी होती थीं, लेकिन पहचान बहुत बड़ी। जहां स्वाद के लिए बड़े-बड़े बोर्ड और विज्ञापन नहीं चाहिए थे। जहां ग्राहक बनता था तो पीढ़ियों तक जुड़ा रहता था। जहां दस पैसे की एक कप चाय लोगों को जोड़ती थी। जहां चाय पीने के लिए सिर्फ प्यास नहीं यादें भी जाया करती थीं। और शायद यही वजह है कि आज इतने साल बाद भी भगवती चाय का नाम लेते ही पुराने रायपुर की तस्वीर आंखों के सामने आ जाती है।
अमृततुल्य से पहले भी रायपुर की अपनी ‘अमृत चाय’ थी…………..
आज अमृततुल्य चाय की चर्चा पूरे देश में है। लेकिन रायपुर के पुराने लोगों से पूछिए वे शायद कहेंगे— बाबू, चाय का स्वाद तो हमने बहुत पहले चखा है
जब जयस्तंभ के पास भगवती की चाय मिला करती थी। क्योंकि कुछ स्वाद सिर्फ जीभ पर नहीं रहते वे शहर की स्मृति में बस जाते हैं। भगवती चाय भी ऐसा ही एक स्वाद था। 1962 से 2008 तक—करीब 46 साल। एक छोटी-सी दुकान ने रायपुर के इतिहास में अपना इतना बड़ा नाम लिख दिया कि दुकान चली गई। लेकिन उसका किस्सा आज भी बाकी है।
अब आपकी बारी………………
क्या आपने भगवती चाय पी है ? क्या आपके पिता, दादा या घर के किसी बड़े ने आपको इसके किस्से सुनाए हैं ? क्या आपको याद है वहां की चाय का स्वाद ? या भगवती चाय से जुड़ा कोई ऐसा किस्सा है जो मैंने यहां नहीं लिखा ? कमेंट में जरूर लिखिए। हो सकता है आपकी एक छोटी-सी याद से रायपुर के पुराने दिनों की कोई बड़ी कहानी फिर सामने आ जाए। यह सिर्फ एक चाय की दुकान की कहानी नहीं यह हमारे पुराने रायपुर की एक प्यारी-सी भूली-बिसरी याद है। भगवती चाय दुकान की तस्वीर ना तो भगवती जी के पुत्रों के पास है ना ही मेरे पास है। इसलिये AI की मदद से काल्पनिक तस्वीर पोस्ट करना पड़ रहा हैं।














