गोकुल सोनी
बारिश तेज थी… हाथों में छाते थे… और कदम एक ही दिशा में बढ़ रहे थे।
दूर से देखने पर लगा जैसे महिलाएं किसी जुलूस में जा रही हों। लेकिन यह कोई जुलूस नहीं था। यह छत्तीसगढ़ की एक पुरानी और अनोखी परंपरा ‘नहावन’ थी।
रायपुर की पुरानी बस्ती में ऐसा ही एक दृश्य देखने को मिला। तेज बारिश के बीच मोहल्ले की महिलाएं, परिवार और सगे-संबंधियों के साथ कतार में छाते लेकर तालाब की ओर जा रही थीं। उनके कदमों में एक अनुशासन था और चेहरे पर उस दुःख की गंभीरता, जो किसी अपने को खोने के बाद पूरे परिवार पर छा जाती है।
हमारे छत्तीसगढ़ के ग्रामीण समाज में किसी परिवार में मृत्यु होने के बाद ‘नहावन’ की परंपरा रही है। परिवार के सदस्य, सगे-संबंधी और मोहल्ले की महिलाएं सामूहिक रूप से तालाब में स्नान करने जाती हैं। पुरुष भी अलग कतार में इसी तरह तालाब जाते हैं और स्नान के बाद उसी अनुशासन के साथ वापस लौटते हैं।
सबसे खास बात यह है कि यह केवल स्नान नहीं, बल्कि सामूहिकता और सहभागिता की परंपरा है। दुःख की घड़ी में पूरा मोहल्ला परिवार के साथ खड़ा होता है। कोई अकेला नहीं रहता। साथ चलना, साथ स्नान करना और फिर साथ लौटना, शायद यही हमारी पुरानी सामाजिक व्यवस्था की सबसे खूबसूरत बात थी।
परंपरा के अनुसार ग्रामीण इलाकों में मृत्यु के बाद लगातार दस दिनों तक तालाब में नहाने जाते हैं। इसके दसवें दिन को दसनाहवन कहते हैं, हर दिन की यह सामूहिक यात्रा केवल एक धार्मिक या सामाजिक रस्म नहीं , बल्कि उस परिवार के दुःख में समाज की भागीदारी का प्रतीक भी है।
हालांकि शहरों में अब यह परंपरा काफी सिमट गई है। कई जगह केवल एक-दो दिन औपचारिक रूप से इसका निर्वहन होता है, लेकिन छत्तीसगढ़ के गांवों में ‘नहावन’ की यह परंपरा आज भी काफी हद तक जीवित है।
आज जब जीवन तेजी से बदल रहा है, पुराने तालाबों की जगह नल और घरों के बाथरूम ने ले ली है और सामूहिक जीवन की जगह निजी जीवन बढ़ता जा रहा है, तब ऐसी परंपराएं हमें हमारी मिट्टी, समाज और आपसी रिश्तों से जोड़ती हैं।
क्या आपके गांव में भी ‘नहावन’ की यह परंपरा आज भी निभाई जाती है ?
और आपके गांव में मृत्यु के बाद कितने दिनों तक यह परंपरा निभाई जाती है ?
बताइएगा, हो सकता है आपकी यादों में छत्तीसगढ़ की कोई ऐसी परंपरा छिपी हो, जिसे अगली पीढ़ी तक पहुंचाना जरूरी है।














