साथियो, छत्तीसगढ़ की असली पहचान सिर्फ यहां की हरियाली, नदियां, पहाड़ और जंगल ही नहीं हैं। हमारी पहचान हमारी समृद्ध लोक परंपराओं, लोकगाथाओं, लोकगीतों, लोकनृत्यों और लोकनाट्यों में भी बसी हुई है। हमारी पीढ़ियों से चली आ रही यह सांस्कृतिक विरासत जितनी पुरानी है, उतनी ही जीवंत और खूबसूरत भी।
इसी लोक विरासत को एक मंच देने के उद्देश्य से संस्कृति विभाग, छत्तीसगढ़ शासन द्वारा महंत घासीदास संग्रहालय परिसर स्थित मुक्ताकाशी मंच में 6 से 8 सितंबर तक ‘लोकरंग पर्व’ का आयोजन किया जा रहा है।
तीन दिनों तक चलने वाले इस आयोजन में छत्तीसगढ़ की अलग-अलग लोक विधाओं को एक ही मंच पर देखने-सुनने का अवसर मिल रहा है। पारंपरिक लोकगाथा, लोकनाट्य, लोकगीत और लोकनृत्य की रंगारंग प्रस्तुतियां न सिर्फ मनोरंजन करती हैं, बल्कि हमें अपनी जड़ों और अपनी मिट्टी से भी जोड़ती हैं।
कल 7 सितंबर को मुझे भी इस खूबसूरत आयोजन को देखने का अवसर मिला। लोरिकचंदा पर आधारित नृत्यनाटिका, ददरिया और एक अन्य गीत पर आधारित प्रस्तुति ने मन मोह लिया। कलाकारों ने जिस आत्मीयता और जीवंतता के साथ अपनी कला प्रस्तुत की, वह सचमुच देखने लायक थी।
लेकिन कल की शाम की एक और खास बात रही, कार्यक्रम का मंच संचालन कर रहीं योगिता साहू।
योगिता ने जिस सहजता, आत्मविश्वास और खूबसूरत छत्तीसगढ़ी अंदाज में कार्यक्रम को आगे बढ़ाया, उसने पूरे आयोजन में जैसे एक अलग ही रंग भर दिया। मंच संचालन सिर्फ कार्यक्रम की कड़ियां जोड़ना नहीं होता, बल्कि दर्शकों को कार्यक्रम से जोड़कर रखना भी होता है। योगिता इस काम को बखूबी करती नजर आईं।
खासकर लोरिकचंदा की कथा और उससे जुड़े छत्तीसगढ़ के गांवों के नामकरण की कहानी को उन्होंने छत्तीसगढ़ी बोली में जिस रोचक और सहज अंदाज में सुनाया, वह अपने आप में शानदार था। उनकी बातों में न बनावटीपन था, न अनावश्यक औपचारिकता। बस थी तो अपनी माटी की खुशबू और छत्तीसगढ़ी बोली की मिठास।
दर्शक और श्रोता भी उनकी एक-एक बात बड़े ध्यान से सुन रहे थे। कई बार ऐसा लगता था कि कार्यक्रम मंच पर नहीं, बल्कि छत्तीसगढ़ के किसी गांव के चौपाल में चल रहा है और कोई अपना ही आदमी बैठकर हमें अपने पुरखों की कहानी सुना रहा है। यही तो हमारी लोक संस्कृति की खूबसूरती है।
ऐसे आयोजन सिर्फ गीत-संगीत और नृत्य देखने का अवसर नहीं देते, बल्कि हमारी उस विरासत से हमारा परिचय कराते हैं जिसे आधुनिकता की दौड़ में कहीं पीछे छोड़ते जा रहे हैं।
‘लोकरंग पर्व’ जैसे आयोजन इसलिए भी जरूरी हैं कि हमारी लोककला सिर्फ संग्रहालयों में सजी तस्वीर बनकर न रह जाए, बल्कि मंच पर जीवंत रहे, नई पीढ़ी तक पहुंचे और आने वाली पीढ़ियां भी अपनी इस अनमोल विरासत पर गर्व कर सकें।
संस्कृति विभाग को ऐसे आयोजन के लिए साधुवाद और इस शानदार प्रस्तुति के लिए सभी कलाकारों को बहुत-बहुत बधाई। और कल की शाम को अपनी आवाज, अंदाज और छत्तीसगढ़ीपन से खास बनाने वाली योगिता साहू को भी विशेष बधाई।
मंच पर कलाकार अपनी कला से रंग भरते हैं, लेकिन एक अच्छा संचालक पूरे कार्यक्रम में जान डाल देता है। कल योगिता ने यही काम किया।














