रायगढ़। रायगढ़ के औद्योगिक क्षेत्र में फ्लाई ऐश के निस्तारण को लेकर एक बार फिर गंभीर सवाल खड़े हो गए हैं। सूचना के अधिकार (आरटीआई) के तहत प्राप्त दस्तावेजों के अनुसार NRVS Steels Limited ने वर्ष 2024 के कई महीनों की मासिक फ्लाई ऐश उपयोग रिपोर्ट में दावा किया है कि संयंत्र से उत्पन्न फ्लाई ऐश का 100 प्रतिशत उपयोग ईंट निर्माण (ब्रिक मेकिंग) में किया गया। वहीं दूसरी ओर जिले के विभिन्न क्षेत्रों में नालों, नदी किनारों, जंगलों और खेतों के आसपास फ्लाई ऐश के ढेर दिखाई देने तथा ग्रामीणों की लगातार शिकायतों ने इन दावों की सत्यता पर सवाल खड़े कर दिए हैं।
दस्तावेजों के मुताबिक कंपनी ने मई 2024 में 7,978.28 मीट्रिक टन, जून में 8,295.94 मीट्रिक टन, जुलाई में 9,741.29 मीट्रिक टन, सितंबर में 13,626.16 मीट्रिक टन, अक्टूबर में 6,142.97 मीट्रिक टन, नवंबर में 9,510.95 मीट्रिक टन तथा दिसंबर में 10,266.55 मीट्रिक टन फ्लाई ऐश उत्पन्न होने का उल्लेख किया है। इन सभी महीनों में उपयोग का प्रतिशत 100 दर्शाया गया है और प्रमुख उपयोग केवल ईंट निर्माण बताया गया है।
रिपोर्टों में फ्लाई ऐश श्री दुर्गा फ्लाई ऐश ब्रिक, मयंक अग्रवाल तथा कुछ महीनों में एनआर ब्रिक्स प्लांट को उपलब्ध कराने का उल्लेख है। हालांकि सवाल यह उठ रहा है कि क्या इन इकाइयों की वास्तविक उत्पादन क्षमता इतनी है कि वे हर महीने हजारों मीट्रिक टन फ्लाई ऐश का वैज्ञानिक तरीके से उपयोग कर सकें। इस संबंध में उत्पादन क्षमता, मशीनरी, बिजली खपत, श्रमिकों की संख्या और बाजार में आपूर्ति का स्वतंत्र सत्यापन हुआ या नहीं, यह भी स्पष्ट नहीं है।
इधर बरपाली नाला, बरदे नाला और केलो नदी के आसपास फ्लाई ऐश डंपिंग के वीडियो और स्थानीय ग्रामीणों के आरोप मामले को और गंभीर बना रहे हैं। ग्रामीणों का कहना है कि बारिश के दौरान राख बहकर जलस्रोतों तक पहुंच रही है। ऐसे में यदि दस्तावेजों के अनुसार पूरी फ्लाई ऐश पहले ही उपयोग में लाई जा चुकी थी, तो खुले क्षेत्रों में दिखाई देने वाली राख का स्रोत क्या है, यह बड़ा सवाल बन गया है।
जानकारों का कहना है कि रायगढ़ जिले में फ्लाई ऐश का परिवहन करोड़ों रुपये का कारोबार बन चुका है। प्रतिदिन बड़ी संख्या में वाहन विभिन्न उद्योगों से फ्लाई ऐश लेकर निकलते हैं। अधिकांश उद्योग सरकारी रिकॉर्ड में 99 से 100 प्रतिशत उपयोग का दावा करते हैं, जबकि दूसरी ओर ग्रामीण लगातार खेतों, जंगलों, नालों और नदी किनारों पर फ्लाई ऐश जमा होने की शिकायत करते रहे हैं।
सरकारी समेकित रिपोर्ट के अनुसार अप्रैल 2024 से मार्च 2025 के बीच रायगढ़ जिले में लगभग 1.97 करोड़ मीट्रिक टन फ्लाई ऐश उत्पन्न हुई और लगभग पूरी मात्रा के उपयोग का दावा किया गया है। हालांकि जमीनी स्तर पर प्रदूषण संबंधी शिकायतें इन दावों की स्वतंत्र जांच की आवश्यकता को और मजबूत करती हैं।
विशेषज्ञों का मानना है कि ऐसे मामलों में केवल मासिक रिपोर्ट पर्याप्त नहीं होती। फ्लाई ऐश उपयोग के दावों की पुष्टि के लिए ईंट निर्माण इकाइयों की वास्तविक उत्पादन क्षमता, थर्ड पार्टी ऑडिट, जीपीएस आधारित परिवहन सत्यापन, डंपिंग स्थलों का ड्रोन सर्वे तथा नदी और भूजल की वैज्ञानिक जांच आवश्यक है। यदि दस्तावेजों और वास्तविक स्थिति में अंतर पाया जाता है तो संबंधित मामलों में जवाबदेही भी तय की जानी चाहिए।
सात महीने, हर बार 100 प्रतिशत उपयोग का दावा
मई, जून, जुलाई, सितंबर, अक्टूबर, नवंबर और दिसंबर 2024 की मासिक रिपोर्टों में कंपनी ने हजारों मीट्रिक टन फ्लाई ऐश उत्पन्न होने के बाद उसका 100 प्रतिशत उपयोग मुख्य रूप से ईंट निर्माण में दर्शाया है। लगातार सात महीनों तक समान दावा किए जाने से इन रिपोर्टों के स्वतंत्र सत्यापन की मांग और तेज हो गई है।
उठ रहे प्रमुख सवाल
- क्या संबंधित ईंट निर्माण इकाइयों की वास्तविक उत्पादन क्षमता इतनी है कि वे हर महीने हजारों टन फ्लाई ऐश का उपयोग कर सकें?
- यदि पूरा उपयोग हो चुका था तो नालों, जंगलों और नदी किनारों पर दिखाई देने वाली फ्लाई ऐश कहां से आई?
- क्या फ्लाई ऐश परिवहन और उपयोग का कभी स्वतंत्र भौतिक सत्यापन कराया गया?
- क्या नियामक एजेंसियां अब पूरे मामले की सार्वजनिक और निष्पक्ष जांच कराएंगी?













