रायपुर। छत्तीसगढ़ शासन के शासकीय विमान से कथा वाचक धीरेंद्र कृष्ण शास्त्री को सुविधा दिया जाना कई गंभीर सवाल खड़े करता है। सबसे पहला और मूल प्रश्न यही है कि क्या धीरेंद्र कृष्ण शास्त्री किसी संवैधानिक पद पर आसीन हैं? इसका उत्तर स्पष्ट है—नहीं। वे न तो निर्वाचित जनप्रतिनिधि हैं और न ही किसी संवैधानिक संस्था से जुड़े हुए हैं। ऐसे में करदाताओं के पैसे से संचालित शासकीय विमान का उपयोग किसी निजी धार्मिक कार्यक्रम के लिए किस नियम और अधिकार के तहत किया गया, यह अब भी अस्पष्ट है।
संविधान का अनुच्छेद 14 सभी नागरिकों को समानता का अधिकार देता है। यदि एक कथा वाचक को सरकारी संसाधनों की सुविधा दी जा सकती है, तो फिर आम नागरिक, लेखक, कलाकार या सामाजिक कार्यकर्ता इससे वंचित क्यों रहते हैं? यह चयन किस आधार पर हुआ—आस्था, प्रभाव या सत्ता से निकटता? यह सवाल अब सार्वजनिक बहस का विषय बन गया है।
मामले को और गंभीर बनाता है वह दृश्य, जिसमें एक पुलिस अधिकारी द्वारा धीरेंद्र कृष्ण शास्त्री के पैर छूते हुए देखा गया। पुलिस बल का दायित्व संविधान और कानून के प्रति निष्ठा रखना है, न कि किसी व्यक्ति विशेष या धार्मिक आस्था के प्रति। वर्दी में इस प्रकार का आचरण केवल व्यक्तिगत श्रद्धा का मामला नहीं, बल्कि राज्य की निष्पक्षता और धर्मनिरपेक्ष छवि पर भी प्रश्नचिह्न लगाता है।
यह प्रश्न किसी व्यक्ति की निजी आस्था पर नहीं, बल्कि सरकारी संसाधनों के उपयोग और संवैधानिक मर्यादाओं के पालन से जुड़ा है। लोकतांत्रिक व्यवस्था में सत्ता, प्रशासन और धर्म के बीच स्पष्ट सीमाएं होना अनिवार्य है। इन्हीं सीमाओं के धुंधले होने पर आज सवाल उठ रहे हैं।














