रायगढ़ जिले के तमनार में महिला पुलिसकर्मी के साथ हुई बर्बरता केवल एक अपराध नहीं, बल्कि मानवता पर किया गया हमला है। यह ऐसा घिनौना कृत्य है, जिसके दोषियों के लिए किसी तरह की नरमी का कोई स्थान नहीं होना चाहिए। ऐसे मामलों में कठोरतम दंड, यहाँ तक कि फांसी की मांग उठना स्वाभाविक है, क्योंकि यह अपराध केवल एक व्यक्ति के विरुद्ध नहीं, बल्कि पूरे समाज और कानून-व्यवस्था को चुनौती देता है।
लेकिन इससे भी अधिक भयावह और शर्मनाक वह दृश्य है, जिसमें पुलिस और प्रशासन खुद कानून को ताक पर रखकर न्यायाधीश बनने लगते हैं। आरोपी को पकड़ने के बाद उसका सार्वजनिक अपमान, जुलूस निकालना, प्रतीकों के माध्यम से उसे नीचा दिखाना—यह सब किसी लोकतांत्रिक व्यवस्था में नहीं, बल्कि भीड़तंत्र और पुलिसिया अहंकार में होता है। यह न्याय नहीं, यह सत्ता का नंगा प्रदर्शन है।
सबसे चिंताजनक तथ्य यह है कि आरोपी की बेटी को सामने आकर कहना पड़ा कि “मेरे पिता दोषी हैं तो उन्हें अदालत और कानून सजा दे, पुलिस नहीं।” यह बयान हमारे शासन-प्रशासन के मुंह पर करारा तमाचा है। सवाल सीधा है—पुलिस कब से अदालत बन गई? किस कानून में लिखा है कि आरोपी को सजा देने से पहले उसका जुलूस निकाला जाए? अगर उस दौरान आरोपी के साथ कोई अनहोनी हो जाती, उसकी जान चली जाती, तो उसकी जिम्मेदारी कौन लेता—थाना प्रभारी, जिला प्रशासन या सरकार?
महात्मा गांधी ने स्पष्ट कहा था कि अपमान भी हिंसा है। लेकिन यहाँ तो राज्य स्वयं हिंसा का औजार बनता दिख रहा है। जब सरकार और पुलिस अपराधियों की तरह व्यवहार करने लगें, तब अपराध और शासन में फर्क ही क्या रह जाता है? ऐसे कृत्य न केवल संविधान का अपमान हैं, बल्कि न्यायपालिका की गरिमा और कानून के राज को भी रौंदते हैं।
महिलाओं के सम्मान की दुहाई देने वाले यह भूल जाते हैं कि चूड़ी, बिंदी या लिपस्टिक को अपमान का प्रतीक बनाना स्वयं स्त्री-विरोधी और विकृत सोच है। यह महिलाओं की गरिमा की रक्षा नहीं, बल्कि उसे राजनीतिक और प्रशासनिक तमाशा बनाना है।
दोषी को सख्त से सख्त सजा मिलनी चाहिए—इसमें कोई संदेह नहीं। लेकिन सजा अदालत देगी, कानून देगा, न कि वर्दी में खड़ा कोई उन्मादी अधिकारी। अगर शासन खुद भीड़ की भाषा बोलेगा, तो कल कोई भी सुरक्षित नहीं रहेगा। आज आरोपी है, कल कोई निर्दोष भी हो सकता है।
यह समय आत्ममंथन का है। सरकार और प्रशासन को तय करना होगा कि वे संविधान के साथ खड़े हैं या भीड़ और बदले की मानसिकता के साथ। क्योंकि अगर कानून की हत्या इसी तरह होती रही, तो एक दिन यही कानून सबको कटघरे में खड़ा करेगा।


















