• Home
  • ब्लॉग
  • जब सवाल धर्म का नहीं, भविष्य का हो—तो सत्ता को जवाब देना पड़ता है
Image

जब सवाल धर्म का नहीं, भविष्य का हो—तो सत्ता को जवाब देना पड़ता है


कभी-कभी लोकतंत्र में एक तस्वीर हजार भाषणों से ज्यादा ताकतवर होती है। छात्रों का आंदोलन और उसके बीच शिक्षा मंत्री का इस्तीफा इसी बदलते भारत की एक तस्वीर है। इसे केवल किसी एक मंत्री के इस्तीफे तक सीमित करके देखना शायद पूरे घटनाक्रम को छोटा कर देना होगा। असली सवाल यह है कि क्या अब सत्ता से जवाबदेही मांगने वाली नई पीढ़ी तैयार हो चुकी है?
वीकेंड आने से पहले ही सियासी माहौल बदल गया। जिस इस्तीफे को कोई राजनीतिक मजबूरी कहेगा, कोई नैतिक जिम्मेदारी और कोई दबाव का परिणाम—उससे बड़ा संदेश सड़कों पर खड़े छात्रों ने दिया है। सत्ता कितनी भी मजबूत क्यों न हो, जब सवाल लाखों युवाओं के भविष्य का हो तो उसे जवाब देना ही पड़ता है।
Gen Z की राजनीति को समझने के लिए पुराने राजनीतिक चश्मे उतारने होंगे। यह पीढ़ी केवल जाति, धर्म और मंदिर-मस्जिद के सवालों से अपनी पूरी राजनीति तय नहीं करना चाहती। उसके सामने नौकरी है, परीक्षा है, पेपर लीक है, पारदर्शिता है, महंगाई है, शिक्षा है और अपने भविष्य की चिंता है। उसे भाषण से ज्यादा परिणाम चाहिए।
यह लोकतंत्र के लिए अच्छी खबर है।
लेकिन यहां एक सावधानी भी जरूरी है। किसी मंत्री का इस्तीफा अपने आप में व्यवस्था में सुधार की गारंटी नहीं है। असली परीक्षा उसके बाद शुरू होती है। परीक्षा प्रणाली में पारदर्शिता आए, पेपर लीक और अनियमितताओं पर प्रभावी कार्रवाई हो, दोषियों की जवाबदेही तय हो और किसी विद्यार्थी का भविष्य व्यवस्था की लापरवाही की भेंट न चढ़े—तभी इस्तीफा सार्थक माना जाएगा।
जनता को नेताओं से प्रेम करने के बजाय उनके काम का मूल्यांकन करना चाहिए। लोकतंत्र में नेता जनता के सेवक हैं, नायक नहीं। सत्ता किसी पार्टी की स्थायी संपत्ति नहीं और कोई पद किसी व्यक्ति का स्थायी अधिकार नहीं।
आज की युवा पीढ़ी अगर यह सवाल पूछ रही है कि “काम नहीं हुआ तो जिम्मेदारी कौन लेगा?”, तो यह सवाल केवल एक मंत्री से नहीं, हर सरकार और हर जनप्रतिनिधि से पूछा जाना चाहिए।
और यही लोकतंत्र की खूबसूरती है—कुर्सी बड़ी नहीं होती, जनता बड़ी होती है।
Gen Z ने अगर यह तय कर लिया है कि वह भावनात्मक नारों से आगे बढ़कर शिक्षा, रोजगार, पारदर्शिता और जवाबदेही की बात करेगी, तो आने वाले वर्षों की राजनीति का एजेंडा भी बदलना तय है।

Releated Posts

रायपुर का कलाईपारा… नाम सुना है ? लेकिन क्या आप जानते हैं कि इस मोहल्ले का नाम ‘कलाईपारा’ क्यों पड़ा ?

गोकुल सोनी साथियो, समय-समय पर मैं रायपुर की पुरानी बस्तियों, चौक-चौराहों और पारों के उन नामों की कहानी…

ByByRaipurNow Sep 4, 2026

छत्तीसगढ़ का वह रहस्यमयी ‘किसबिन मेला’जिसकी गूंज विधानसभा से लेकर दिल्ली-बंबई तक पहुंची थी।

गोकुल सोनी साथियों, मेले तो आपने बहुत देखे होंगे, लेकिन क्या आपने कभी ऐसा मेला सुना है, जिसका…

ByByRaipurNow Aug 21, 2026

छत्तीसगढ़ का ‘नहावन’, जो सिखाता है दुःख में साथ खड़ा होना

गोकुल सोनी बारिश तेज थी… हाथों में छाते थे… और कदम एक ही दिशा में बढ़ रहे थे।दूर…

ByByRaipurNow Aug 18, 2026

रायपुर की वो चाय…अमृततुल्य के जमाने से बहुत पहले रायपुर में था चाय का एक ऐसा जादू

10 पैसे की ‘भगवती चाय’ के लिए लगती थी लाइन, दिन में तीन बार खाली होता था गल्लागोकुल…

ByByRaipurNow Aug 17, 2026

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *