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लोकतांत्रिक शिष्टाचार और सत्ता के अहंकार की पड़ताल

6 दिसंबर भारतीय सार्वजनिक जीवन का एक विचित्र, किंतु महत्वपूर्ण संयोग है। एक ओर यह दिन संविधान निर्माता डॉ. भीमराव अम्बेडकर के महापरिनिर्वाण का प्रतीक है—उन अम्बेडकर का, जिन्होंने लोकतंत्र को केवल शासन प्रणाली नहीं, बल्कि सामाजिक न्याय और राजनीतिक शिष्टाचार की जीवनशैली के रूप में परिभाषित किया। दूसरी ओर यही तारीख 1992 में भारतीय लोकतंत्र की सबसे गहरी चोट का भी स्मरण कराती है, जब बहुलतावादी राष्ट्रवाद पर एक ध्रुवीकरणकारी घटना का साया पड़ा था।

आज, 2025 में, वही दिन एक और प्रश्न खड़ा करता है—सत्ता में बैठे लोग लोकतांत्रिक मर्यादाओं को कितनी गंभीरता से लेते हैं? और अगर वे नहीं लेते, तो इसकी राजनीतिक और नैतिक कीमत कौन चुकाएगा?

डॉ. अम्बेडकर का स्मरण: अनुशासन की कसौटी डॉ. अम्बेडकर ने लोकतंत्र के बारे में एक बार कहा था कि यह “केवल सरकारी ढांचों का समूह नहीं, बल्कि नैतिक आचरण का नाम है। अस्पष्ट नहीं कि लोकतंत्र अपनी शुरुआत संविधान की सुन्दर प्रस्तावना से नहीं, बल्कि सत्ता पक्ष और विपक्ष के बीच स्थापित शिष्टाचार से होती है। वही शिष्टाचार तय करता है कि सत्ता में बैठे कितने भी शक्तिशाली क्यों न हों, उन्हें अपने राजनीतिक प्रतिद्वंद्वी का सम्मान करना ही होगा।
लेकिन बीते दिनों घटी घटनाओं ने यह सवाल कड़ा कर दिया है कि क्या भारतीय लोकतंत्र अपने उस बुनियादी अनुशासन को खोने लगा है, जिसे बनाने में दशकों लगे?

स्टेट डिनर का बहिष्कार: एक संकेत से ज्यादा राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन की आधिकारिक भारत यात्रा कूटनीति के लिहाज़ से महत्वपूर्ण थी। ऐसे मौकों पर राष्ट्रपति द्वारा आयोजित स्टेट डिनर केवल औपचारिकता नहीं, बल्कि भारत के राजनीतिक तंत्र के सामूहिक प्रतिनिधित्व का मंच होता है। परंतु इस बार लोकसभा के नेता प्रतिपक्ष और राज्यसभा के नेता प्रतिपक्ष को निमंत्रण नहीं भेजा गया। यह कोई साधारण चूक नहीं। यह लोकतांत्रिक प्रोटोकॉल के लिहाज़ से एक असंगत और अस्वस्थ संकेत है।

  1. स्टेट डिनर का मूल अर्थ ही प्रतिनिधित्व है : यहां विपक्ष की उपस्थिति केवल ‘सद्भावना’ का मामला नहीं, बल्कि संविधान द्वारा स्वीकृत व्यवस्था का अभिन्न हिस्सा है। विपक्ष को बाहर रखना उस विचार पर प्रहार है कि लोकतंत्र नीतियों और निर्णयों की साझा संरचना है।
  2. सत्ताधारी दल का प्रशासनिक आत्मविश्वास प्रश्नों में : जब सरकार विपक्ष की उपस्थिति से भी असहज होने लगे, तो यह संदेश साफ़ मिलता है कि संवाद और असहमति के प्रति उसका भरोसा कम हो रहा है।
    यह आत्मविश्वास का नहीं, बल्कि असुरक्षा का लक्षण है।
  3. अंतरराष्ट्रीय संकेतों का महत्व : दुनिया ध्यान देती है कि एक लोकतांत्रिक देश अपने गृह राजनीति में कितनी परिपक्वता दिखाता है। भारत एक उभरती वैश्विक शक्ति है; ऐसे में विपक्ष को स्टेट डिनर से बाहर रखना विश्व मंच पर एक अनावश्यक और असहज संदेश देता है।

अयोध्या की घटना: स्थानीय स्तर पर भी वही प्रवृत्ति इसी मानसिकता का एक दूसरा रूप अयोध्या संसदीय क्षेत्र में दिखा, जब वहां के निर्वाचित सांसद को स्थानीय कार्यक्रम में आमंत्रित नहीं किया गया। यह घटना बताती है कि बहिष्कार की राजनीति केवल राष्ट्रीय स्तर का खेल नहीं रही, यह अब स्थानीय प्रशासन और आयोजनों तक फैल चुकी है। एक ऐसी व्यवस्था, जिसमें निर्वाचित जनप्रतिनिधि को केवल राजनीतिक भिन्नता के कारण मंच तक आने से रोका जाए, वह धीरे-धीरे लोकतांत्रिक संस्कृति को खोखला कर देती है।

फासीवाद के घटक और वर्तमान परिदृश्य : यह कहना अतिशयोक्ति नहीं कि असहमति को हाशिये पर धकेलने की प्रवृत्ति फासीवादी ढांचों की शुरुआती पहचान होती है। फासीवाद किसी देश पर एक दिन में नहीं आता; वह संस्थाओं को धीरे-धीरे कमजोर करके आता है— पहले विपक्ष को औपचारिक आयोजनों से दूर रखकर, फिर संवाद को सीमित करके, और अंततः केवल सत्ता-समर्थक कथन को ही मानक बनाकर। जब राजनीति इस स्थिति तक पहुँचती है कि विपक्ष का अस्तित्व भी सत्ता को खलने लगे, तो सत्ता लोकतंत्रीय से अधिक अधिनायकवादी बन जाती है।

उड़ती चिड़िया के पर गिनने का अंतरराष्ट्रीय विश्लेषण : विश्व राजनीति के विशेषज्ञ—खासतौर पर वे राष्ट्र जो वैश्विक दक्षिण के देशों की नीतियों का विश्लेषण करते हैं—सिर्फ बड़े निर्णयों पर नहीं, बल्कि सूक्ष्म संकेतों पर भी ध्यान देते हैं। वे यह भी आंकते हैं कि किसी देश में संस्थाएं कितनी स्वतंत्र हैं, राजनीतिक संवाद कितना खुला है और सत्ता कितनी जवाबदेह है।

भारत की विदेश नीति यदि “बहुलतावादी लोकतंत्र” के वैश्विक सम्मान पर आधारित है, तो ऐसे कदम उस छवि को कमजोर करते हैं।

राजनयिक परंपराओं में कभी भी विरोधी विचार को खतरे के रूप में नहीं, बल्कि प्रणाली की शक्ति के रूप में देखा जाता है।
भारत इस मान्यता को जितना कमजोर करेगा, उसकी वैश्विक नैतिक पूंजी उतनी ही कम होगी।

1992 से 2025: लोकतंत्र की दो विपरीत दिशाएं
1992 की घटना भारत के धर्मनिरपेक्ष ढांचे को चुनौती देने वाली थी।
2025 की यह घटना राजनीतिक बहुलवाद की अनदेखी का संकेत है।

दोनों घटनाएं भले स्वरूप में भिन्न हों, पर उनका केंद्र बिंदु एक ही है—
भारत की लोकतांत्रिक आत्मा को सीमित करने की प्रवृत्ति।

6 दिसंबर इस लिहाज़ से आत्मावलोकन का दिन है—
कि क्या हम उस राह पर तो नहीं बढ़ रहे जहां लोकतंत्र के मूल तत्व राजनीति में औपचारिकता के स्तर पर रह जाएंगे, लेकिन व्यवहार में समाप्त हो जाएंगे?

सत्ता का अहंकार और लोकतंत्र का क्षरण : सत्ता की निरंतरता किसी भी लोकतंत्र में स्थायी नहीं होती। लेकिन लोकतांत्रिक संस्कृति स्थायी होती है—यदि उसे बचाया जाए। दुर्भाग्य से, हाल के कदम दिखाते हैं कि सत्ता राजनीतिक अहंकार को शिष्टाचार पर वरीयता दे रही है।

क्योंकि इतिहास साक्षी है— सत्ता जब अहंकार में चूर होती है, विपक्ष को शत्रु मानने लगती है, और अपने चारों ओर राजनीतिक एकांत बनाती है, तो उसका पतन केवल समय की प्रतीक्षा बन जाता है। लोकतंत्र में चुनाव विपक्ष की हार से नहीं, सत्ता पक्ष की सीमाओं को स्वीकार करने की नैतिकता से जीते जाते हैं।

लोकतंत्र का भविष्य संवाद में, बहिष्कार में नहीं : भारत की लोकतांत्रिक परंपरा हमेशा संवाद, सह–अस्तित्व और पारस्परिक सम्मान की रही है।
स्टेट डिनर से लेकर स्थानीय आयोजनों तक, किसी भी निर्वाचित प्रतिनिधि का बहिष्कार इस परंपरा के लिए शुभ संकेत नहीं है।

आज 6 दिसंबर हमें यह याद दिलाता है कि— अम्बेडकर का लोकतंत्र अहंकार का नहीं, संवाद का लोकतंत्र था। विपक्ष को दूर रखना शक्ति का नहीं, भय का लक्षण है।
सत्ता जितना बहिष्कार करेगी, उतना ही लोकतांत्रिक पूंजी खोती जाएगी।
भारत विश्व राजनीति में तभी सम्मानित रहेगा, जब उसका आंतरिक लोकतंत्र भी उतना ही परिपक्व दिखेगा।
लोकतंत्र की सेहत केवल चुनावी जीत से तय नहीं होती;
वह तय होती है कि सत्ता अपने विपक्ष, जनता और संवैधानिक संस्थाओं के साथ कैसा व्यवहार करती है।

रामप्रसाद जायसवाल

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