गोकुल सोनी
आज की पीढ़ी शायद विश्वास भी न करे कि एक समय रायपुर की गलियों की पहचान मॉल, सुपरमार्केट या ऑनलाइन डिलीवरी नहीं, बल्कि गूंजती हुई आवाज़ें थीं।
आइए, आपको लगभग 1970 के आसपास के रायपुर, खासकर पुरानी बस्ती के बंधवापारा की एक सैर कराता हूं। उन दिनों मेरी छोटी दीदी यहीं रहती थीं। मैं अक्सर मां के साथ गांव से उनके घर आया करता था। गांव में नाश्ता करने की कोई परंपरा ही नहीं थी। इसलिए “ब्रेड” क्या होती है, यह हम जानते भी नहीं थे। हमारे लिए वह “डबलरोटी” थी।
सुबह होते ही गली में एक लंबी पुकार गूंजती—
“डब्बलरोटी………………..!”
आवाज़ सुनते ही हम दौड़कर बाहर निकल आते। एक दुबला-पतला आदमी अपने गले में रस्सी से तेल का बड़ा पीपा लटकाए रहता था। उस पीपे के सामने शीशा लगा होता था, जिसके भीतर सजी डबलरोटियां दिखाई देती थीं। ऊपर का ढक्कन खोलकर वह ग्राहक को डबलरोटी निकालकर देता। उसके पास दो तरह की डबलरोटी होती थी। एक पांच पैसे वाली, जो गोल और मोटी होती थी, बिल्कुल रोटी जैसी। दूसरी चार आने वाली, कागज़ में लिपटी, स्लाइस में कटी हुई।
मां हमेशा हमारे लिए पांच पैसे वाली डबलरोटी खरीदती थीं। हम उसे चाय में डुबो-डुबोकर खाते थे। सच कहूं तो आज भी उस भीगी हुई डबलरोटी का स्वाद मेरी यादों में वैसे ही ताज़ा है। आज करोड़ों रुपये की बेकरी बन गईं, लेकिन उस पांच पैसे वाली डबलरोटी का स्वाद फिर कभी नहीं मिला।
मुझे उस डबलरोटी वाले का हुलिया आज भी याद है। घुटनों तक मोड़ा हुआ पायजामा, सिर पर पतली टोपी, पैरों में घिसे हुए चप्पल, हल्की बढ़ी दाढ़ी और तेज़ चाल। चलते-चलते वह बस एक ही शब्द बोलता— “डब्बलरोटी…”
जमादारिन………………….
कुछ देर बाद एक और दृश्य दिखाई देता, जो आज की पीढ़ी के लिए शायद कल्पना से भी परे हो। उस समय अधिकांश घरों में सेप्टिक टैंक नहीं होते थे। कच्चे, भंगी-युक्त शौचालय हुआ करते थे। एक जमादारिन (सफाई महिलाकर्मी ) बड़ी टोकरी लेकर आती और मानव मल को सिर पर उठाकर ले जाती।
गांव में हमने ऐसा कभी नहीं देखा था। वहां लोग खेतों या तालाब किनारे शौच के लिए जाते थे। इसलिए यह दृश्य हमें आश्चर्यचकित भी करता था और शहर और गांव के फर्क का पहला परिचय भी देता था।
थोड़ी देर बाद एक अधेड़ महिला सिर पर बांस की टोकरी रखे आवाज़ लगाती—
“मुडमिंजनी मांटी…”
पहली बार पता चला कि यह काली मिट्टी होती है, जिससे महिलायें बाल धोती थीं। हमें तो सबसे बड़ा आश्चर्य यही होता था कि गांव की मिट्टी भी शहर में बिकती है!
दोपहर होते-होते गलियां फिर जीवंत हो उठतीं—
“फल्ली गरम…”
“चनाचूर गरम…”
और फिर आता मनिहारी सामान और बर्तनों से भरा ठेला। ठेले के चारों ओर महिलाओं की भीड़ लग जाती। बर्तन, चूड़ियां, कंघी, बिंदी, शीशा, सुई-धागा… न जाने क्या-क्या बिकता था। सबसे दिलचस्प बात यह थी कि अधिकांश सामान उधार पर खरीदा जाता था। विश्वास ही उस समय की सबसे बड़ी पूंजी था।
लकड़ी की भूंसी…………
उन्हीं दिनों एक और बात हमें बेहद हैरान करती थी। आज की तरह हर घर में रसोई गैस नहीं होती थी। अधिकांश परिवार लकड़ी की भूंसी से जलने वाली सिगड़ी पर ही खाना बनाते थे। इसलिए दोपहर होते-होते गलियों में एक ठेला दिखाई देता, जिस पर बोरियों में भरा आरा-भूंसा बिकता था। घरों की महिलायें अपनी ज़रूरत के हिसाब से भूंसा खरीदतीं और वही उनके चूल्हे का ईंधन बनता।
इसी बीच एक और आवाज़ कानों में पड़ती—
“छेना ले… छेना…!”
पहली बार सुनकर हम समझ ही नहीं पाए कि यह क्या बिक रहा है। बाहर निकलकर देखा तो गांव की महिलायें सिर पर बड़ी-बड़ी टोकरियों में छेना (उपले या कंडे) भरकर बेच रही थीं। शहर में लोग उन्हें खरीदकर चूल्हा जलाने के काम में लाते थे।
हमारे लिए यह किसी अजूबे से कम नहीं था। गांव में तो हर घर में मवेशी होते थे और कंडे घर पर ही बना लिए जाते थे। कंडे भी कभी बिक सकते हैं, यह बात हमने पहली बार रायपुर आकर ही जानी।
आज जब हर रसोई में गैस, इंडक्शन और माइक्रोवेव ने जगह बना ली है, तब सोचता हूं कि उस दौर का पूरा शहर आरा-भूंसे, सिगड़ी और कंडों की महक में सांस लेता था।
शाम ढलती……………….
बिजली के खंभों पर लगे 40 वॉट के बल्ब टिमटिमाने लगते। पूरा मोहल्ला हल्की पीली रोशनी में डूब जाता। तभी अंधेरे को चीरती एक और आवाज़ सुनाई देती—
“तेल मालिश………”
मैंने उस व्यक्ति का चेहरा शायद कभी नहीं देखा, लेकिन उसकी आवाज़ आज भी कानों में गूंजती है। वह छोटे-छोटे शीशियों में तेल लेकर चलता था और सम्पन्न घरों में जाकर मालिश किया करता था।
आज सोचता हूं…
उस दौर में न मोबाइल थे, न टीवी, न इंटरनेट, न फूड ऐप, न ऑनलाइन शॉपिंग। लेकिन हर गली की अपनी पहचान थी, हर आवाज़ की अपनी कहानी थी और हर दिन अपने आप में एक उत्सव था।
आज वे आवाज़ें ख़ामोश हो चुकी हैं, लेकिन मेरी स्मृतियों में वे अब भी उतनी ही साफ़ सुनाई देती हैं—
“डब्बलरोटी…”
“मुडमिंजनी मांटी…”
“फल्ली गरम…”
“तेल मालिश…”
यही था लगभग 1970 का रायपुर—जहां शहर केवल मकानों से नहीं, बल्कि इंसानों और उनकी आवाज़ों से बसता था।
क्या आपको भी अपने बचपन के शहर की ऐसी कोई आवाज़ आज भी याद है ? कमेंट में ज़रूर लिखिए। हो सकता है आपकी यादें भी किसी और के चेहरे पर मुस्कान ले आये।
अगर यह संस्मरण आपको अपने बचपन में ले गया हो, तो इसे अपने दोस्तों के साथ ज़रूर साझा करें। शायद उनकी यादों के दरवाज़े भी खुल जायें।














