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मुख्यमंत्री के गृहग्राम बगिया में विकास कार्य ठप! सरपंच सीएम की भाभी, फिर भी उपसरपंच व पंचों ने सामूहिक इस्तीफा सौंपा

रायपुर/बगिया | मुख्यमंत्री के गृहग्राम बगिया में विकास कार्यों की वास्तविक स्थिति सामने आने के बाद राजनीतिक हलकों में नई चर्चा शुरू हो गई है। गाँव की सरपंच जहाँ मुख्यमंत्री के भाई की पत्नी हैं, वहीं ग्राम पंचायत के उपसरपंच और कई पंचों ने विकास न होने से नाराज़ होकर सामूहिक इस्तीफ़ा दे दिया। प्रतिनिधियों का आरोप है कि पंचायत में महीनों से कोई काम नहीं हुआ, जबकि योजनाओं के लिए बजट और फाइलें मौजूद हैं।

कागज़ों में योजनाएँ, ज़मीनी स्तर पर कुछ नहीं : पंचों का आरोप पंचों का कहना है कि पंचायत क्षेत्र में न तो सड़क निर्माण हुआ, न ही पानी, नाली और अन्य बुनियादी सुविधाओं पर कोई काम दिखाई देता है।
उपसरपंच ने इस्तीफ़ा देते हुए कहा : हमने कई बार सरपंच और अधिकारियों को अवगत कराया, लेकिन सुनवाई कहीं नहीं हुई। जब जनता हमसे जवाब मांगती है और हमें कुछ करने नहीं दिया जाता, तो पद पर बने रहने का कोई मतलब नहीं।”

ग्रामीणों ने भी आरोप लगाया कि गाँव की समस्याएँ वर्षों से जस की तस पड़ी हैं। पेयजल आपूर्ति, सड़क मरम्मत, स्ट्रीट लाइट और सफाई व्यवस्था जैसी मूलभूत सुविधाएँ भी बेहतर नहीं हुईं।

सरपंच की पहचान पर सवाल, यदि यहाँ काम नहीं हो रहा तो बाकी प्रदेश का क्या?

गाँव की सरपंच मुख्यमंत्री के भाई की पत्नी होने के कारण यह मुद्दा और भी चर्चा में है। ग्रामीणों का कहना है कि यदि मुख्यमंत्री के गाँव में ही विकास कार्यों की ऐसी स्थिति है, तो पूरे प्रदेश की हालत का अनुमान लगाया जा सकता है। स्थानीय लोगों ने कहा सरकार भाषणों में व्यस्त है, ज़मीन पर विकास शून्य है। गृहग्राम में ही विकास नहीं दिख रहा, तो और स्थानों पर क्या उम्मीद की जाए?

राजनीतिक गलियारों में हलचल, विपक्ष ने उठाए सवाल :

इस सामूहिक इस्तीफ़े के बाद विपक्ष ने सरकार को आड़े हाथ लेते हुए कहा कि यह घटना बताती है कि प्रदेश में विकास सिर्फ कागज़ों में हो रहा है, असल ज़िंदगी में नहीं।
विपक्षी दलों का बयान है जब मुख्यमंत्री के अपने गाँव के प्रतिनिधि ही काम न होने से परेशान हैं, तो राज्य के अन्य क्षेत्रों की कल्पना आसानी से की जा सकती है।

ग्रामीणों में असंतोष, प्रतिनिधियों में हताशा : लगातार शिकायतों के बावजूद कोई कार्रवाई न होने से ग्राम पंचायत के प्रतिनिधि ही नहीं, ग्रामीण भी नाराज़ हैं। आम लोगों का कहना है कि गाँव की बुनियादी समस्याएँ लंबे समय से लंबित हैं और सुधार की दिशा में कोई ठोस कदम नहीं उठाया गया।

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