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हांगकांग में रहने वाले तिब्बती धर्मगुरु सोनम लामा की प्रेरक कहानी : 15 सालों से मैनपाट के गरीब परिवारों की कर रहे सेवा


कहते हैं खाली हाथ आया हूँ, खाली हाथ जाऊँगा

संजय रजक अंबिकापुर। सरगुजा के मैनपाट में जन्मे 54 वर्षीय तिब्बती धर्मगुरु सोनम लामा आज भले ही हांगकांग में पूजा-पाठ का कार्य करते हों, लेकिन दिल आज भी अपने गाँव के लोगों के साथ है। हांगकांग में मिलने वाली दानराशि को वे हर साल मैनपाट आकर गरीब परिवारों और जरूरतमंद बच्चों की सेवा में खर्च करते हैं। पिछले 8–9 वर्षों से वे स्वेटर, साल, जूते-चप्पल, कंबल और आवश्यक सामग्री का नियमित वितरण करते आ रहे हैं।

सादगी से भरा जीवन जीने वाले सोनम लामा का न परिवार है, न पत्नी-बच्चे। उनके लिए गाँव के लोग ही असली परिवार हैं। 2016 में शुरू हुई उनकी सेवा पहल आज भी निर्बाध जारी है।

स्कूलों के बच्चों के लिए अनूठी पहल
8–9 सालों से शैक्षणिक सामग्री का वितरण

सोनम लामा ने बताया कि वे बीते कई वर्षों से छोटे सरकारी स्कूलों में बच्चों को शैक्षणिक सामग्री उपलब्ध करा रहे हैं। बच्चों की मुस्कान उन्हें सबसे बड़ा सुख देती है। पहले वे ठंड में कंबल-चादर बाँटते थे, बाद में बच्चों की जरूरतों को प्राथमिकता देना शुरू किया।

बचपन की यादों ने दिखाया सेवा का रास्ता

वे अपने पिता के साथ बीते दिनों को याद करते हुए बताते हैं कि गाँव के लोग शादी-ब्याह और त्योहारों में उन्हें प्यार से भोजन कराते थे और समझाते थे बड़े होकर गाँव की सेवा करना। यही संस्कार आज उन्हें लगातार सेवा करने की प्रेरणा देते हैं।

हांगकांग में रहते हुए भी गाँव के लिए समर्पण : पिछले 14–15 सालों से हांगकांग में रहने वाले सोनम लामा वहाँ पूजा-पाठ से मिली दानराशि सीधे गाँव के बच्चों और गरीब परिवारों की मदद में लगाते हैं। किसी तरह का व्यक्तिगत जीवन न होने की वजह से गाँव के बच्चे ही उनका परिवार हैं।

2023–24 में स्वेटर, 2025 में बच्चों को चप्पल वितरण : पिछले दो सालों में उन्होंने सैकड़ों बच्चों को स्वेटर दिए। बच्चों की मांग पर इस बार 150 बच्चों को चप्पल बाँटी गईं। इसके अलावा उन्होंने कुनिया से कोरवा पारा स्कूल के लिए 215 स्वेटर भी खरीदे हैं, जिनका वितरण जल्द होगा।
लालिया और सरभंजा जैसे स्कूलों में भी शीघ्र ही सामग्री पहुँचाई जाएगी।

खाली हाथ आया था, खाली हाथ जाऊँगा सादगी की मिसाल : सोनम लामा कहते हैं सब कुछ ऊपर वाला देता है, मैं तो सिर्फ उसे जरूरतमंदों तक पहुँचाने का माध्यम हूँ। पथल में खाया चावल-दाल, गाँव का प्यार और पुराने लोगों की सीख आज भी उनका संबल है।

गाँव से बोधगया और फिर हांगकांग तक की यात्रा : मैनपाट के 2 नंबर कैंप में जन्मे सोनम लामा यहीं पढ़े-बढ़े। आगे की शिक्षा के लिए बोधगया गए और बाद में हांगकांग पहुँचे। आज उम्र 54 पार कर चुकी है, लेकिन गाँव की सेवा का जज़्बा अभी भी पहले जैसा ही है।

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