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आश्वासन थमा, पुल नहीं… कौरगांव के ग्रामीणों ने खुद खड़ा किया जिंदगी का ‘जुगाड़ पुल’

दंतेवाड़ा | अबूझमाड़ से लगी दंतेवाड़ा जिले की कौरगांव पंचायत की दुर्गम बस्तियों में आज भी बुनियादी सुविधाएं सिर्फ वादों में ही सिमटी हैं। सड़क, स्वास्थ्य और शिक्षा जैसी जरूरतें आसान नहीं, पर सबसे बड़ी समस्या रही—गोयन्दर नाला पर स्थायी पुल की कमी। ग्रामीण पिछले कई वर्षों से जनप्रतिनिधियों से लेकर जिला प्रशासन तक गुहार लगाते रहे, लेकिन हर बार उन्हें “जल्द होगा” जैसे आश्वासनों से ही संतोष करना पड़ा।

लंबे इंतज़ार और लगातार उपेक्षा के बाद गांववालों ने तय किया कि अब और भरोसा नहीं, जरूरतों का हल खुद ढूंढा जाएगा। इसी सोच के साथ उन्होंने बांस, मजबूत पत्थरों और पुराने बिजली पोलों को जोड़कर एक देसी जुगाड़ पुल खड़ा कर दिया। यह पुल भले ही अस्थायी और जोखिम भरा है, लेकिन फिलहाल यही उनके लिए जीवनरेखा बन गया है।

स्कूल, बाजार, अस्पताल—सब इसी पुल पर निर्भर
गांव के बच्चे रोज इसी पुल से स्कूल पहुंचते हैं। किसान सब्जी और अनाज लेकर बाजार जाते हैं। किसी के बीमार पड़ने पर उसे चारपाई में उठाकर इसी रास्ते से दंतेवाड़ा तक ले जाया जाता है। बारिश के दिनों में नाला उफान पर होता है तो यह जुगाड़ पुल ही गांव और बाकी दुनिया के बीच एकमात्र सहारा बन जाता है।

ग्रामीण बोले—उपेक्षा ने मजबूर किया, नहीं तो जान जोखिम में क्यों डालते
ग्रामीणों का कहना है कि अबूझमाड़ से सटे गांवों की समस्याएं वर्षों से अनदेखी होती रही हैं। पुल की मांग करते-करते थक गए। हर बार अधिकारी आते हैं, फोटो खिंचता है, फाइल बनती है और बात वहीं खत्म हो जाती है। मजबूरी में हमें ही रास्ता बनाना पड़ रहा है, ग्रामीणों ने बताया।

विकास के दावों पर सवाल
कौरगांव की यह स्थिति सरकारी विकास दावों पर बड़ा सवाल खड़ा करती है। जहां कागजों में सड़क, पुल और कनेक्टिविटी के कई प्रोजेक्ट चलते दिखते हैं, वहीं हकीकत में ग्रामीणों को अपनी सुरक्षा तक की जिम्मेदारी खुद उठानी पड़ रही है।

अबूझमाड़ के दिल से उठी यह तस्वीर बताती है
जब सिस्टम की उदासीनता सालों तक बनी रहती है, तो लोग मजबूरी में अपने दम पर विकास की राह बनाते हैं—चाहे वह जोखिम भरी ही क्यों न हो। कौरगांव का यह ‘जुगाड़ पुल’ सिर्फ बांस-पत्थरों का ढांचा नहीं, बल्कि उपेक्षा और संघर्ष के बीच जिंदा रहने की कहानी है।

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